Four numbers have been given, out of which three are alike in some manner and one is different. Select the one that is different. चार संख्याएँ दी गई हैं, जिनमें से तीन किसी तरह से समान हैं, जबकि एक असंगत है। असंगत का चयन करें।
8 के प्रथम 20 गुणकों का औसत ज्ञात कीजिए।
An arrangement in which the accounting work of each individual is checked by other members is known as :/ऐसी व्यवस्था को, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति का लेखा कार्य अन्य सदस्यों द्वारा जाँचा जाता है, कहते हैं–
Which of the following particles has zero charge? निम्नलिखित में से किस कण पर शून्य आवेश होता है?
इंजेक्शन प्रेशर अधिक होने का कारण हो सकता है–
The thickness of steel in main members not directly exposed to weather shall not be less than
Three partners shared the profit in a business in the ratio 8 : 7 : 5. They invested their capitals for 7 months, 8 months and 14 months, respectively. What was the ratio of their capitals?
स्वास्थ्य और चरित्र एक-दूसरे से घनिष्ठता के साथ जुड़े होते हैं। वही व्यक्ति स्वस्थ होता है जिसके चरित्र में आत्मसंयम हो। चारित्रिक दूषण व्यक्ति के पतन का कारण होता है। आत्मसंयम को चरित्र की सीढ़ी कहा गया है। इसी सीढ़ी के माध्यम से कोई व्यक्ति उत्तरोत्तर विकास की यात्रा तय करता है। व्यायाम को स्वास्थ्य का सहोदर कहा गया है। यही किसी व्यक्ति की काया और चित्त को निर्मल और नीरुज (रोगरहित) बनाता है। चरित्र की रक्षा का अर्थ है–काया और चित्त को विभिन्न दूषणों से मुक्त करना। स्वास्थ्य का सहोदर है
To which stage, Emotional Functional game is related:
निर्देश- प्रश्न संख्या (185 से 191) निम्नलिखितं गद्यांशं पठित्वा सप्तप्रश्नानां उत्तराणि समुचितं विकल्पं चित्वा दत्त– अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे मदोत्कटो नाम सिंह: प्रतिवसति स्म। तस्य च अनुचरा अन्य द्वीपिवायसगोमायव: सन्ति । अथ कदाचित् तै: इतस्ततो भ्रमद्भि: सार्थभ्रष्ट: क्रथनको नाम उष्टो दृष्ट:। अथ सिंह आह- ‘‘अहो! अपूर्वमिदं सत्त्वम् । तज्ज्ञायतां किमेतदारण्यकं ग्राम्यं वा’’ इति। तच्छ्रुत्वा वायस आह- ‘‘भो स्वामिन्! ग्राम्योऽयमुष्ट्रनामा जीवविशेषस्तव भोज्य:। तत् व्यापाद्यताम्। सिंह आह- ‘‘नाहं गृहमागतं हन्मि उक्तञ्च। तद्भय प्रदानं दत्त्वा मत्सकाशमानीयतां येन अस्यागमनकारणं पृच्छामि’’। अथ असौ सर्वैरपि विश्वासस्य अभयप्रदानं दत्त्वा मदोत्कटसकाशमानीत: प्रणम्योपविष्टश्च। ततस्तस्य पृच्छतस्तेनात्मवृत्तान्त: सार्थभ्रंशसमुद्भवो निवेदित:। तत: सिंहेनोक्तम् - ‘‘भो क्रथनक! मा त्वं ग्रामं गत्वा भूयोऽपि भारोदवहनकष्टभागी भूया:। तदत्रैव अरण्ये निर्विशज्रे मरकतसदृशानि शष्पाग्राणि भक्षयन् मया सह सदैव वस’’। सोऽपि तथेत्युक्त्वा तेषां मध्ये विचरन् न कुतोऽपि भयमिति सुखेन आस्ते। तथान्येद्युर्मदोत्कटस्य महागजेन अरण्यचारिणा सह युद्धमभवत् । ततस्तस्य दन्तमुशलप्रहारैव्यर्था सञ्जाता। व्यथित: कथमपि प्राणैर्न वियुक्त:। अथ शरीरसामर्थ्यात न कुत्रचित्पदमपि चलितुं शक्नोति तेऽपि सर्वे काकादयोऽप्रभुत्वेन क्षुधाविष्टा: परं दु:खं भेजु: अथ तान् सिंह: प्राह- ‘‘भो! अन्विष्यतां कुत्रचित् किञ्चित् सत्त्वं येन अहं एतामपि दशां प्राप्तस्तद्धत्वा युष्मद्भोजनं सम्पादयामि’’। अथ ते चत्वारोऽपि भ्रमितुमारब्धा यावन्न किञ्चित् सत्त्वं पश्यन्ति तावद्वायसशृगालौ परस्परं मन्त्रयत:। शृगाल आह - ‘‘भो वायस! किं प्रभूतभ्रान्तेन, अयमस्माकं प्रभो: क्रथनको विश्वस्तस्तिष्ठति तदेनं हत्वा प्राणयात्रां कुर्म:। वायस आह- ‘‘युक्तमुक्तं भवता, परं स्वामिना तस्य अभयप्रदानं दत्तमास्ते न वध्योऽयम्’’ इति।
Explanations:
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