Explanations:
``योग: कर्मसु कौशलम्'' इति कथन गीताया: ग्रन्थस्य। अर्थात् ``योग ही कर्मों में कुशलता है'' यह कथन गीता का है। श्रीमद्भगवद्गीता में योग का व्यवहारिक पक्ष लेकर प्रतिपादित है कि जो कर्मों में कुशलता है वही योग होता है जिसके बिना जीवनयात्रा में मानसिक उद्वेग को उत्पन्न करने में आकस्मिक रूप से उपस्थित सुख-दु:ख रूप आवेग अवसादों में झञ्झावत में भी विचलित न होने वाली समत्व की स्थिति योग कहलाती है।