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Q: .
  • A. खेड़ा सत्याग्रह
  • B. बारदोली सत्याग्रह
  • C. चंपारण सत्याग्रह
  • D. दांडी मार्च
Correct Answer: Option C - 19वीं सदी के आरंभ में गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया, जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया’ पद्धति कहते थे। जर्मनी में रासायनिक रंगों के आविष्कार के बाद चंपारण के यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बंद करने को मजबूर हुए। किसान भी इस अनुबंध से मुक्त होना चाहते थे लेकिन इस अनुबंध से मुक्त करने के लिए बागान मालिकों ने लगान व अन्य गैर कानूनी करों (आब्बाबों) को मनमाने ढंग से बढ़ा दिया। इस बढ़ोत्तरी के खिलाफ किसानों का विरोध काफी मुखर हुआ। किसानों के समक्ष उपस्थित संकट से मुक्ति दिलाने के लिए राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी को चंपारण आने के लिए राजी किया। मामले में गाँधीजी के हस्तक्षेप से सरकार ने एक आयोग गठित किया और गाँधीजी को भी इसका सदस्य बनाया। अंतत: चम्पारण एग्रेरियन एक्ट 1917 बनाकर तिनकठिया पद्धति को समाप्त कर दिया गया एवं बागान मालिक अवैध वसूली का एक चौथाई वापस करने को राजी हुए।
C. 19वीं सदी के आरंभ में गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया, जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया’ पद्धति कहते थे। जर्मनी में रासायनिक रंगों के आविष्कार के बाद चंपारण के यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बंद करने को मजबूर हुए। किसान भी इस अनुबंध से मुक्त होना चाहते थे लेकिन इस अनुबंध से मुक्त करने के लिए बागान मालिकों ने लगान व अन्य गैर कानूनी करों (आब्बाबों) को मनमाने ढंग से बढ़ा दिया। इस बढ़ोत्तरी के खिलाफ किसानों का विरोध काफी मुखर हुआ। किसानों के समक्ष उपस्थित संकट से मुक्ति दिलाने के लिए राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी को चंपारण आने के लिए राजी किया। मामले में गाँधीजी के हस्तक्षेप से सरकार ने एक आयोग गठित किया और गाँधीजी को भी इसका सदस्य बनाया। अंतत: चम्पारण एग्रेरियन एक्ट 1917 बनाकर तिनकठिया पद्धति को समाप्त कर दिया गया एवं बागान मालिक अवैध वसूली का एक चौथाई वापस करने को राजी हुए।

Explanations:

19वीं सदी के आरंभ में गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया, जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया’ पद्धति कहते थे। जर्मनी में रासायनिक रंगों के आविष्कार के बाद चंपारण के यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बंद करने को मजबूर हुए। किसान भी इस अनुबंध से मुक्त होना चाहते थे लेकिन इस अनुबंध से मुक्त करने के लिए बागान मालिकों ने लगान व अन्य गैर कानूनी करों (आब्बाबों) को मनमाने ढंग से बढ़ा दिया। इस बढ़ोत्तरी के खिलाफ किसानों का विरोध काफी मुखर हुआ। किसानों के समक्ष उपस्थित संकट से मुक्ति दिलाने के लिए राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी को चंपारण आने के लिए राजी किया। मामले में गाँधीजी के हस्तक्षेप से सरकार ने एक आयोग गठित किया और गाँधीजी को भी इसका सदस्य बनाया। अंतत: चम्पारण एग्रेरियन एक्ट 1917 बनाकर तिनकठिया पद्धति को समाप्त कर दिया गया एवं बागान मालिक अवैध वसूली का एक चौथाई वापस करने को राजी हुए।