Correct Answer:
Option A - ‘अग्निरनुष्ण: कृतकत्वाज्जलवत्’ अत्र ‘कृतकत्वात्’ कालात्ययापदिष्ट: हेत्वाभास: अस्ति। अर्थात् ‘अग्नि अनुष्ण (तेजरहित) है, कृतक (जन्य) होने से जल के समान।’ यहाँ कृतक जन्य हेतु होने से कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास है।
लक्षण- ‘पक्षे प्रमाणान्तरावधृत साध्याभावो हेतुर्बाधितविषय: कालात्ययापदिष्ट:’ अर्थात् पक्ष में जिस साध्य का अभाव अन्य प्रमाण से निश्चित कर लिया जाता है वह कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास है। इस उदाहरण में कृतकत्व हेतु का साध्य अनुष्णत्व है, इसका अभाव प्रत्यक्ष स्पर्श से निश्चित हो जाता है क्योंकि अग्नि उष्ण है। हेत्वाभास पाँच प्रकार के होते हैं– असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, प्रकरणसम, कालात्ययापदिष्ट भेदात् पञ्चैव। (तर्कभाषा)
A. ‘अग्निरनुष्ण: कृतकत्वाज्जलवत्’ अत्र ‘कृतकत्वात्’ कालात्ययापदिष्ट: हेत्वाभास: अस्ति। अर्थात् ‘अग्नि अनुष्ण (तेजरहित) है, कृतक (जन्य) होने से जल के समान।’ यहाँ कृतक जन्य हेतु होने से कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास है।
लक्षण- ‘पक्षे प्रमाणान्तरावधृत साध्याभावो हेतुर्बाधितविषय: कालात्ययापदिष्ट:’ अर्थात् पक्ष में जिस साध्य का अभाव अन्य प्रमाण से निश्चित कर लिया जाता है वह कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास है। इस उदाहरण में कृतकत्व हेतु का साध्य अनुष्णत्व है, इसका अभाव प्रत्यक्ष स्पर्श से निश्चित हो जाता है क्योंकि अग्नि उष्ण है। हेत्वाभास पाँच प्रकार के होते हैं– असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, प्रकरणसम, कालात्ययापदिष्ट भेदात् पञ्चैव। (तर्कभाषा)