Q: अन्नदानात्परं दानं विद्यादानमत: परम् अन्नेन क्षणिका तृप्ति: यावज्जीवं च विद्यया ।। 1 ।। पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ।। 2 ।। अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ च मध्यमा:। उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ।। 3 ।। साक्षरं पुरुषं दृष्ट्वा यो नरो नाभिमन्यते। बलीवर्दसमो लोके खुरशृंगविवर्जित: ।। 4 ।। वृथावृष्टि: समुद्रेषु वृथा तृप्तस्य भोजनम्। वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीपो दिवापि च ।। 5 ।। यस्मिन् देशे न सम्मानो न प्रीतिर्न च बान्धवा:। न च विद्यागम: कश्चित् न तत्र दिवसं वसेत् ।। 6।। 4. कीदृशं धनं कार्यकाले लाभप्रदं न भवति?
A.
परहस्तगतम्
B.
निजहस्तगतम्
C.
मातु: हस्तगतम्
D.
पितु: हस्तगम्
Correct Answer:
Option A - ‘परहस्तगतं धनं’ कार्यकाले लाभप्रदं न भवति। उपर्युक्त पद्यांश से तात्पर्य है कि दूसरे के हाथ में गया ‘धन’ समय आने पर लाभप्रद (लाभकारी) नहीं होता है।
A. ‘परहस्तगतं धनं’ कार्यकाले लाभप्रदं न भवति। उपर्युक्त पद्यांश से तात्पर्य है कि दूसरे के हाथ में गया ‘धन’ समय आने पर लाभप्रद (लाभकारी) नहीं होता है।
Explanations:
‘परहस्तगतं धनं’ कार्यकाले लाभप्रदं न भवति। उपर्युक्त पद्यांश से तात्पर्य है कि दूसरे के हाथ में गया ‘धन’ समय आने पर लाभप्रद (लाभकारी) नहीं होता है।
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