Explanations:
जैन धर्म ‘जिन’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है मनोवेगों पर विजय प्राप्त करने वाला। इसके लिए ‘तीर्थंकर’ शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। तीर्थंकर वह है जो संसार के महासमुद्र से पार उतरने के लिए घाटों का निर्माण करता है। पूज्य होने के कारण इन्हें ‘अर्हत्’ भी कहते हैं। जैन सिद्धान्त के अन्तर्गत काल को ‘उत्सर्पिणी (उत्थान की अवस्था)’ तथा ‘अवसर्पिणी ’(पतन की अवस्था)’ के अनन्त चक्रों की शृंखला में बाँटा गया है तथा प्रत्येक चक्रीय कालों को पुन: छ: चक्रों में बाँटा गया है। इसके अधीन कुल 24 तीर्थंकरों का जन्म होता है। इसी चक्र के अधीन जैन धर्म के संस्थापक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव तथा अंतिम 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म होता है। भद्रबाहु द्वारा रचित ‘कल्पसूत्र’ में जैन तीर्थंकरों का जीवन वृतान्त प्राप्त होता है। तीर्थंकर (Tirhankara) प्रतिमालक्षण (Cognizance) 1. ऋषभदेव (आदिनाथ) वृषभ 2. अजितनाथ हाथी 3. सम्भवनाथ अश्व 4. अभिनन्दन बन्दर 5. सुमतिनाथ क्रौंच पक्षी 6. पद्मप्रभु (पद्मनाथ) कमल (पद्म) 7. सुपाश्र्वनाथ स्वास्तिक 8. चन्द्रप्रभु (चन्द्रप्रभा) अर्द्धचन्द्र 9. पुष्पदत्त मगर 10. शीतलनाथ कल्पवृक्ष 11. श्रेयांसनाथ खड्ग (गैंडा) 12. वासुपूज्य भैंसा 13. विमलनाथ वराह 14. अनंतनाथ सेही (बाज) 15. धर्मनाथ वङ्कादंड 16. शान्तिनाथ हरिण (हिरण) 17. वुंâथुनाथ बकरा (छाग) 18. अर्हनाथ मत्स्य (नन्दिव्रत) 19. मल्लिनाथ कलश (जल-कलश) 20. मुनि सुव्रत कूर्म (कछुआ) 21. नमिनाथ नीला कमल (नीलोत्पल) 22. नेमिनाथ (अरिष्टनेमी) शंख 23. पार्श्व नाथ सर्प-फण 24. महावीर स्वामी सिंह जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी को माना जाता है। यद्यपि जैन परम्परा में अंतिम 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी को जैन धर्म का संस्थापक न मानकर पहले से चले आ रहे धर्म का सुधारक माना गया है। नोट- नाथमुनि (रंगनाथाचार्य) ने ‘श्री वैष्णव सम्प्रदाय’ की स्थापना की एवं श्री रंगम मंदिर में अपना जीवन व्यतीत किया था। इन्होंने न्यायतत्व, नालियार प्रबन्धनम् तथा योग रहस्य नामक ग्रंथों की रचना की।