Correct Answer:
Option D - पुराने साहित्य में स्त्री स्वतंत्रताच के योग्य नहीं होती यह ‘मनुस्मृति’ धर्मग्रंथ में लिखा गया है। वैसे तो मनुस्मृति में 12 अध्याय के अन्तर्गत चारों वर्ण विषयक कर्म, नियम, दण्ड, राजनियम पर सूक्ष्मता से विचार विमर्श किया गया है। परन्तु इस वर्ण भेद के अन्तर्गत पुरुष व स्त्री विषयक धर्म पर अलग-अलग विचार भी प्रमुख ध्यान देने योग्य है।
‘‘स्वभाव एव नारीणां नराणमिह दूषणम् ।
अतोडथन्ति प्रमाद्यन्ति प्रभदासु विभाचिता:।।’’
अर्थात् पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है। इसलिए विवेक पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमोद नहीं करते। इस संसार में जो काम, क्रोध के वशीभूत है वे चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनको युवा स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है। मनुस्मृति में स्त्रियों की दशा को बहुत नकारात्मक तरीके से बताया गया है।
D. पुराने साहित्य में स्त्री स्वतंत्रताच के योग्य नहीं होती यह ‘मनुस्मृति’ धर्मग्रंथ में लिखा गया है। वैसे तो मनुस्मृति में 12 अध्याय के अन्तर्गत चारों वर्ण विषयक कर्म, नियम, दण्ड, राजनियम पर सूक्ष्मता से विचार विमर्श किया गया है। परन्तु इस वर्ण भेद के अन्तर्गत पुरुष व स्त्री विषयक धर्म पर अलग-अलग विचार भी प्रमुख ध्यान देने योग्य है।
‘‘स्वभाव एव नारीणां नराणमिह दूषणम् ।
अतोडथन्ति प्रमाद्यन्ति प्रभदासु विभाचिता:।।’’
अर्थात् पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है। इसलिए विवेक पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमोद नहीं करते। इस संसार में जो काम, क्रोध के वशीभूत है वे चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनको युवा स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है। मनुस्मृति में स्त्रियों की दशा को बहुत नकारात्मक तरीके से बताया गया है।