Explanations:
न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिण: अस्य सुभाषितस्य रचनाकार: भारवि:। हितैषी अप्रिय लगने वाले भी हितकारी वचनों को कहने में कोई संकोच नहीं करते। यह सूक्ति महाकवि भारवि के किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग से है। वनेचर युधिष्ठिर का सच्चा हितैषी था वह उन सम्पूर्ण बातों को युधिष्ठिर से बताया जो युधिष्ठिर को सुनने में भले ही अप्रिय लगा लेकिन उनके हित में था। इसीलिए कि सच्चा हितैषी अप्रिय लगने वाले हितकारी वचनों को कहने में संकोच नहीं करते।