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Q: निर्देश:(91-97) अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा तदाधारितप्रश्नानां विकल्पात्मकोत्तरेषु उचिततमम् उत्तर चिनुत। एक पिपीलिका आसीत् । एकदा आहारार्थं भ्रमन्ती सा कमपि आम्रस्य पादपं समारोहत् । वृक्षस्य शाखासु धावन्ती सा अकस्माद् अस्खलत् , अपतञ्च अधस्ताद् भरिते जलाशये। तस्मिन्नेव वृक्षे कस्यचित् कपोतस्य कुलाय: अभवत्। स तत्र स्थित: जले निमज्जन्तीं पिपीलिकाम् अपश्यत। मृयमाणायां तस्यां पिपीलिकायां दयालु: स कपोत: शुष्कम् आम्रस्य दलमेकमपातयत् । तत् पत्रंं जले अतरत्। पिपीलिका च तस्मिन्नारूढा सती स्वजीवितम् अरक्षत्, आविरकरोञ्च कृतज्ञातम्। तत: तौ मित्रे अभवताम् । तत: दिनेषु गच्छत्सु एकदा स कपोत: वृक्षस्य शाखायाम् एकाकी अतिष्ठत्, पिपीलिका च वृक्षस्य मूले स्वरूप बिलस्य द्वारि कर्मपरा अभवत्। तदैव कश्चिद् व्याघ: आगत्य कपोतं हन्तुं धनुषि बाणसन्धानम् अकरोत्। पिपीलिका तमपश्यत् । सा धावन्ती व्याधस्य स्कन्धम् आरुह्य क्रोधेन तं तथा अदशत् यथा दंशपीडित: स व्याध: लक्ष्याद् अपाराध्यत् । धर्नुवक्र: शरश्च अन्यां दिशाम् अगच्छत् । तस्य शब्दं श्रुत्वा कपोतश्व उड्डीय वृक्षान्तरम् अयासीत् । एवं तौ विपदि परस्परं साहाय्यं कुर्वन्तौ चिरं सुखेन न्यवसताम् । ‘उड्डीय’ इति पदे क: कृदन्तप्रत्यय: प्रयुक्त:?
  • A. क्तवा
  • B. ल्यप्
  • C. शतृ
  • D. शानच्
Correct Answer: Option B - ‘उड्डीय’ इति पदे ल्यप् कृदन्तप्रत्यय: प्रयुक्त:। उड्डीय इस पद में ल्यप् कृदन्त प्रत्यय प्रयुक्त है। ‘क्त्वा’ कर। करके- क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय क्त्वा का त्वा शेष रहता है। क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय धातु के अन्तिम वर्ण में ‘इ’ का प्रयोग होता है। यदि अन्तिम वर्ण में कोई स्वर की मात्रा न हो तो। जैसे- धातु प्रत्यय शब्द अर्थ धाव् – क्त्वा धावित्वा दौड़कर चल् – क्त्वा चलित्वा चलकर हस् – क्त्वा हसित्वा हँसकर ल्यप् प्रत्यय में धातु से पूर्व उपसर्ग का प्रयोग होना आवश्यक है। ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग करते समय ल्यप् का ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र + हस् + ल्यप् = प्रहस्य आ + नी + ल्यप् = आनीय प्र + आप् + ल्यप् = प्राप्य शतृ- शतृ प्रत्यय का प्रयोग वर्तमान काल अर्थ में होता है। इस प्रत्यय का पुल्लिंग में अन् स्त्रीलिंग में अन्ती तथा नपुंसकालिङ्गं में अत् शेष रहता है। कर्ता के लिङ्ग व वचन के अनुसार क्रिया (शतृ) का लिङ्ग वचन होता है। शतृ प्रत्यय में पुल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिंग के रूप भवत् के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के अनुसार चलते है। शानच्- आत्मनेपद धातुओं में शानच् प्रत्यय होता है। पुल्लिंग में आन स्त्री. में आना नपु. में आनम् जुड़ता है। पुल्लिंग में रामवत् स्त्री. में लतावत् नपुं में फलवत् चलेंगे। जैसे- पु० स्त्री० नपु० सेव् + शानच् – सेवमान: सेवमाना सेवमानम् सह् + शानच् – सहमान: सहमाना सहमानम्
B. ‘उड्डीय’ इति पदे ल्यप् कृदन्तप्रत्यय: प्रयुक्त:। उड्डीय इस पद में ल्यप् कृदन्त प्रत्यय प्रयुक्त है। ‘क्त्वा’ कर। करके- क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय क्त्वा का त्वा शेष रहता है। क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय धातु के अन्तिम वर्ण में ‘इ’ का प्रयोग होता है। यदि अन्तिम वर्ण में कोई स्वर की मात्रा न हो तो। जैसे- धातु प्रत्यय शब्द अर्थ धाव् – क्त्वा धावित्वा दौड़कर चल् – क्त्वा चलित्वा चलकर हस् – क्त्वा हसित्वा हँसकर ल्यप् प्रत्यय में धातु से पूर्व उपसर्ग का प्रयोग होना आवश्यक है। ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग करते समय ल्यप् का ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र + हस् + ल्यप् = प्रहस्य आ + नी + ल्यप् = आनीय प्र + आप् + ल्यप् = प्राप्य शतृ- शतृ प्रत्यय का प्रयोग वर्तमान काल अर्थ में होता है। इस प्रत्यय का पुल्लिंग में अन् स्त्रीलिंग में अन्ती तथा नपुंसकालिङ्गं में अत् शेष रहता है। कर्ता के लिङ्ग व वचन के अनुसार क्रिया (शतृ) का लिङ्ग वचन होता है। शतृ प्रत्यय में पुल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिंग के रूप भवत् के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के अनुसार चलते है। शानच्- आत्मनेपद धातुओं में शानच् प्रत्यय होता है। पुल्लिंग में आन स्त्री. में आना नपु. में आनम् जुड़ता है। पुल्लिंग में रामवत् स्त्री. में लतावत् नपुं में फलवत् चलेंगे। जैसे- पु० स्त्री० नपु० सेव् + शानच् – सेवमान: सेवमाना सेवमानम् सह् + शानच् – सहमान: सहमाना सहमानम्

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‘उड्डीय’ इति पदे ल्यप् कृदन्तप्रत्यय: प्रयुक्त:। उड्डीय इस पद में ल्यप् कृदन्त प्रत्यय प्रयुक्त है। ‘क्त्वा’ कर। करके- क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय क्त्वा का त्वा शेष रहता है। क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय धातु के अन्तिम वर्ण में ‘इ’ का प्रयोग होता है। यदि अन्तिम वर्ण में कोई स्वर की मात्रा न हो तो। जैसे- धातु प्रत्यय शब्द अर्थ धाव् – क्त्वा धावित्वा दौड़कर चल् – क्त्वा चलित्वा चलकर हस् – क्त्वा हसित्वा हँसकर ल्यप् प्रत्यय में धातु से पूर्व उपसर्ग का प्रयोग होना आवश्यक है। ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग करते समय ल्यप् का ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र + हस् + ल्यप् = प्रहस्य आ + नी + ल्यप् = आनीय प्र + आप् + ल्यप् = प्राप्य शतृ- शतृ प्रत्यय का प्रयोग वर्तमान काल अर्थ में होता है। इस प्रत्यय का पुल्लिंग में अन् स्त्रीलिंग में अन्ती तथा नपुंसकालिङ्गं में अत् शेष रहता है। कर्ता के लिङ्ग व वचन के अनुसार क्रिया (शतृ) का लिङ्ग वचन होता है। शतृ प्रत्यय में पुल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिंग के रूप भवत् के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के अनुसार चलते है। शानच्- आत्मनेपद धातुओं में शानच् प्रत्यय होता है। पुल्लिंग में आन स्त्री. में आना नपु. में आनम् जुड़ता है। पुल्लिंग में रामवत् स्त्री. में लतावत् नपुं में फलवत् चलेंगे। जैसे- पु० स्त्री० नपु० सेव् + शानच् – सेवमान: सेवमाना सेवमानम् सह् + शानच् – सहमान: सहमाना सहमानम्