Correct Answer:
Option D - रसनिष्पत्तिविषये अभिनवगुप्तस्य सिद्धान्त: ‘रसाभिव्यक्तिवाद:’ अस्ति। अर्थात् रसनिष्पत्ति के विषय में अभिनवगुप्त का सिद्धान्त ‘‘विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्ति:।’’ (भरत रससूत्र) अर्थात् विभाव,अनुभाव तथा व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इस निष्पत्ति शब्द को चार रससम्प्रदाय वादियों ने निम्न प्रकार से व्यक्त किया है।
(1) उत्पत्तिवाद– भट्टलोल्लट (मीमांसक) उत्पाद्य-उत्पादक भाव।
(2) अनुमितिवाद– श्री शंकुक (नैयायिक) चित्र-तुरङ्ग न्याय।
(3) भुक्तिवाद– भट्टनायक (सांख्यवादी) भोज्य-भोजक भाव।
(4) अभिव्यक्तिवाद–अभिनवगुप्त शैव वेदान्तशास्त्री व्यङ्ग्य-व्यञ्जक।
Note- साधारणीकरण भट्टनायक ने स्वीकार किया है। अत: विकल्प (d) सही है।
D. रसनिष्पत्तिविषये अभिनवगुप्तस्य सिद्धान्त: ‘रसाभिव्यक्तिवाद:’ अस्ति। अर्थात् रसनिष्पत्ति के विषय में अभिनवगुप्त का सिद्धान्त ‘‘विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्ति:।’’ (भरत रससूत्र) अर्थात् विभाव,अनुभाव तथा व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इस निष्पत्ति शब्द को चार रससम्प्रदाय वादियों ने निम्न प्रकार से व्यक्त किया है।
(1) उत्पत्तिवाद– भट्टलोल्लट (मीमांसक) उत्पाद्य-उत्पादक भाव।
(2) अनुमितिवाद– श्री शंकुक (नैयायिक) चित्र-तुरङ्ग न्याय।
(3) भुक्तिवाद– भट्टनायक (सांख्यवादी) भोज्य-भोजक भाव।
(4) अभिव्यक्तिवाद–अभिनवगुप्त शैव वेदान्तशास्त्री व्यङ्ग्य-व्यञ्जक।
Note- साधारणीकरण भट्टनायक ने स्वीकार किया है। अत: विकल्प (d) सही है।