निर्देश:–अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा प्रश्नानां (338- 345) विकल्पात्मकोत्तरेभ्य: उचिततमम् उत्तरं चिनुत- ग्रामे आसीत् कश्चन दुर्बलकाय:। शरीर-शक्तिहीनताकारणत: स: भृतिकार्यं न प्राप्नोति स्म। स: देवं प्रार्थितवान् - ‘‘भगवन् ! मम उदरपूरणाय काञ्चित् व्यवस्थां परिकल्पयतु कृपया’’ इति। तस्यां रात्रौ तस्य स्वप्ने प्रत्यक्षीभूय भगवान् अवदत् - ‘‘शिलानोदनं कुरु’’ इति। तस्य गृहस्य समीपे काचित् महाशिला आसीत्। स: निर्धन: तस्या: नोदनम् आरब्धवान् । शिला तु महाकारा आसीत् । अत: स: तां कम्पयितुम् अपि न शक्तवान्। तथापि भगवत: आदेशं पालयितुम् इच्छन् स: स्वस्य प्रयत्नं न परित्यक्तवान् । एवमेव कानिचन दिनानि गतानि। जना: तस्य प्रयत्नं दृष्ट्वा उपहासवचनानि उक्तवन्त: ‘तां महाशिलां कम्पयितुम् अपि न शक्नोति भवान् । एतस्या: नोदने प्रवृत्त: भवान् मूर्ख: एव’ इति। एतत् श्रुत्वा अपि निर्धन: स्वस्य प्रयत्नं तु न परित्यक्तवान् । एवमेव मासत्रयम् अतीतम् । तदीय: शिलानोदनप्रयत्न: तु व्यर्थ: एव आसीत् । अत: स: नितरां खिन्न:। स्वस्य दौर्भाभ्यं स्मरन् एकदा स: निद्राम् अकरोत् । तस्य स्वप्ने देव: पुन: प्रत्यक्ष: अभवत् । तं दृष्ट्वा स: निर्धन: - ‘‘देव! व्यर्थकार्ये भवता अहं योजित:। तत् कृतवता मया उपहासपात्रता प्राप्ता’’ इति अवदत् । तदा देव: उक्तवान् - ‘‘भो: ! भवत: परिश्रम: व्यर्थ: न। अत: अलं चिन्तया।’’ तदा क्रुद्ध: निर्धन: अवदत् - ‘‘मया द्वित्रान् मासान् यावत् शिलानोदनं कृतम् । किन्तु शिला न अकम्पत अपि। तां नोत्तुं मया कृत: प्रायस: किं व्यर्थ: न ?’’ इति। ‘‘सा महाशिला भवता कम्पयितुं न शक्या इति अहं जानामि एव। नोदनात् शिला लवमात्रेणापि न अकम्पत इति तु सत्यम् । किन्तु मासत्रयं यावत् भवता य: नोदनप्रयास: कृत: तत: भवत: हस्तौ, पादौ, स्नायवश्च शक्तियुक्ता: जाता:। भवता दृढकायता प्राप्ता। अत: यत्किमपि कार्यं कर्तुं समर्थ: भवान् । मया एतदेव इष्टं, न तु शिलाया: अपसारणम्’’ इति अवदत् भगवान् । शिलानोदनं कुरु इति कस्य कृते निर्देश: आसीत् ?
विपक्ष किस प्रकार सरकार की जवाबदेही को सुनिश्चित करता है?
Probability density function of thermal noise is- तापीय रव (thermal noise) की प्रायिकता घनत्व फलन ............ होता है।
What is a reduced level? समानीत तल क्या है?
What is the process of heat transfer in solids known as?/ठोस पदार्थों में ऊष्मान्तरण (ऊष्मा हस्तांतरण) की प्रक्रिया को..........के रूप में जाना जाता है।
हाल ही में शिपिंग मंत्रालय ने किसे अपना ब्रैंड ऐम्बैसडर नियुक्त किया है?
निर्देश (166-174): निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। व्यक्ति के जीवन में संतोष का बहुत महत्त्व है। संतोषी व्यक्ति सुखी रहता है। असंतोष सब व्याधियों की जड़ है। महात्मा कबीर ने कहा है कि धन-दौलत से कभी संतोष नहीं मिलता। संतोषरूपी धन मिलने पर समस्त वैभव धूल के समान प्रतीत होता है। व्यक्ति जितना अधिक धन पाता जाता है, उतना ही असंतोष उपजता जाता है। यह असंतोष मानसिक तनाव उत्पन्न करता है जो अनेक रोगों की जड़ है। धन व्यक्ति को उलझनों में फँसाता जाता है। साधु को संतोषी बनाया गया है क्योंकि भोजनमात्र से उसे संतोष मिल जाता है। हमें भी साधु जैसा होना चाहिए। हमें अपनी इच्छाओं को सीमित रखना चाहिए जब इच्छाएँ हम पर हावी हो जाती हैं तो हमारा मन सदा असंतुष्ट रहता हैं। सांसारिक वस्तुएँ हमें कभी संतोष नहीं दे सकती। संतोष का संबंध मन से है। संतोष सबसे बड़ा धन है। इसके सम्मुख सोना-चाँदी, रुपया-पैसा व्यर्थ है।गद्यांश के अनुसार यदि व्यक्ति सुख से रहना चाहता है, तो उसे__________ होना होगा।
Which of the following is not an archive format? इनमें से कौन-सा संग्रह प्रारूप नहीं है?
The energy that heat the sun has its origin in सूर्य को ऊष्मा देनेवाली ऊर्जा का स्रोत है
निम्नलिखित में से जातिवाचक संज्ञा कौन-सी है?
Explanations:
Download our app to know more Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Excepturi, esse.
Unlocking possibilities: Login required for a world of personalized experiences.