Correct Answer:
Option B - अलाउद्दीन एक शक्तिशाली मुसलमान सुल्तान था परन्तु उसने शासन में इस्लाम के सिद्धान्तों का पालन नहीं किया। यद्यपि अलाउद्दीन ने ‘यामनी-उल-खिलाफत नासिरी अमीर-मुमनिन’ (खलीफा का नाइब) की उपाधि ग्रहण की थी, जिसका आशय नाममात्र के लिए खलीफा की परम्परा को सत्यापित रखना हो सकता था इसके अलावा कुछ नहीं। अलाउद्दीन ने खलीफा से सुल्तान के पद की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं समझी और न कभी उसके लिए प्रयत्न किया। उलेमा वर्ग से वह कोई सलाह भी नहीं लेता था। इस प्रकार अलाउद्दीन ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया, न उलेमा-वर्ग से सलाह ली और न ही खलीफा के नाम का सहारा लिया। सुल्तान के अधिकारों पर धर्म कोई सीमा लगाये, यह उसे स्वीकार नहीं था।
B. अलाउद्दीन एक शक्तिशाली मुसलमान सुल्तान था परन्तु उसने शासन में इस्लाम के सिद्धान्तों का पालन नहीं किया। यद्यपि अलाउद्दीन ने ‘यामनी-उल-खिलाफत नासिरी अमीर-मुमनिन’ (खलीफा का नाइब) की उपाधि ग्रहण की थी, जिसका आशय नाममात्र के लिए खलीफा की परम्परा को सत्यापित रखना हो सकता था इसके अलावा कुछ नहीं। अलाउद्दीन ने खलीफा से सुल्तान के पद की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं समझी और न कभी उसके लिए प्रयत्न किया। उलेमा वर्ग से वह कोई सलाह भी नहीं लेता था। इस प्रकार अलाउद्दीन ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया, न उलेमा-वर्ग से सलाह ली और न ही खलीफा के नाम का सहारा लिया। सुल्तान के अधिकारों पर धर्म कोई सीमा लगाये, यह उसे स्वीकार नहीं था।