Correct Answer:
Option D - संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात्।
पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च।।
पुरुषचेतनाया: अस्तित्वसिद्धिनिमित्तं वाक्यमस्ति।
सांख्य के अनुसार पुरुष की सत्ता स्वयंसिद्ध है।
इसके अस्तित्व के खंडन में भी इसकी सिद्धि हो जाती है। जो खण्डन कर रहा है वही चेतन आत्मा है पुरुष चेतनाशील है पर निष्क्रिय है। उसके विकारों का उसी प्रकार भोग करता है जैसे राजा स्वयं अन्नोत्पादन नहीं करते हुए भी अन्न का भोग करता है। सांख्य का पुरुष अन्य दर्शनों के आत्मस्वरूप के समान होते हुए भी कुछ दृष्टियों से भिन्न है।
D. संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात्।
पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च।।
पुरुषचेतनाया: अस्तित्वसिद्धिनिमित्तं वाक्यमस्ति।
सांख्य के अनुसार पुरुष की सत्ता स्वयंसिद्ध है।
इसके अस्तित्व के खंडन में भी इसकी सिद्धि हो जाती है। जो खण्डन कर रहा है वही चेतन आत्मा है पुरुष चेतनाशील है पर निष्क्रिय है। उसके विकारों का उसी प्रकार भोग करता है जैसे राजा स्वयं अन्नोत्पादन नहीं करते हुए भी अन्न का भोग करता है। सांख्य का पुरुष अन्य दर्शनों के आत्मस्वरूप के समान होते हुए भी कुछ दृष्टियों से भिन्न है।