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Q: दरिद्रस्य किं शून्यम्?
  • A. गृहम्
  • B. क्षेत्रम्
  • C. सर्वम्
  • D. उपवनम्
Correct Answer: Option C - दरिद्रस्य सर्वम् शून्यं भवति। ‘सर्वं शून्यं दरिद्रस्य’ प्रस्तुत सूक्ति परक वाक्य ‘मृच्छकटिकम्’ से है जो ‘शूद्रक’ विरचित एक प्रकरण ग्रन्थ है इसका नायक ‘चारुदत्त’ जो धीरप्रशान्त कोटि का है। यह दानशीलता के कारण अत्यन्त निर्धन हो गया है फिर भी (दीनानां कल्पवृक्ष:) याचकों के लिए कल्पवृक्ष तुल्य है, अत: चारुदत्त अपनी निर्धनता का स्मरण करते हुए कहता है- शून्यमपुत्रस्य गृहं चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम्। मूर्खस्य दिश: शून्या: सर्वं शून्यं दरिद्रस्य।। अर्थात् दरिद्र के लिए सब कुछ शून्य होता है अत: दरिद्रता से मरण ही श्रेष्ठ होता है। (मरणं मम रोचते न दारिद्रयम्)
C. दरिद्रस्य सर्वम् शून्यं भवति। ‘सर्वं शून्यं दरिद्रस्य’ प्रस्तुत सूक्ति परक वाक्य ‘मृच्छकटिकम्’ से है जो ‘शूद्रक’ विरचित एक प्रकरण ग्रन्थ है इसका नायक ‘चारुदत्त’ जो धीरप्रशान्त कोटि का है। यह दानशीलता के कारण अत्यन्त निर्धन हो गया है फिर भी (दीनानां कल्पवृक्ष:) याचकों के लिए कल्पवृक्ष तुल्य है, अत: चारुदत्त अपनी निर्धनता का स्मरण करते हुए कहता है- शून्यमपुत्रस्य गृहं चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम्। मूर्खस्य दिश: शून्या: सर्वं शून्यं दरिद्रस्य।। अर्थात् दरिद्र के लिए सब कुछ शून्य होता है अत: दरिद्रता से मरण ही श्रेष्ठ होता है। (मरणं मम रोचते न दारिद्रयम्)

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दरिद्रस्य सर्वम् शून्यं भवति। ‘सर्वं शून्यं दरिद्रस्य’ प्रस्तुत सूक्ति परक वाक्य ‘मृच्छकटिकम्’ से है जो ‘शूद्रक’ विरचित एक प्रकरण ग्रन्थ है इसका नायक ‘चारुदत्त’ जो धीरप्रशान्त कोटि का है। यह दानशीलता के कारण अत्यन्त निर्धन हो गया है फिर भी (दीनानां कल्पवृक्ष:) याचकों के लिए कल्पवृक्ष तुल्य है, अत: चारुदत्त अपनी निर्धनता का स्मरण करते हुए कहता है- शून्यमपुत्रस्य गृहं चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम्। मूर्खस्य दिश: शून्या: सर्वं शून्यं दरिद्रस्य।। अर्थात् दरिद्र के लिए सब कुछ शून्य होता है अत: दरिद्रता से मरण ही श्रेष्ठ होता है। (मरणं मम रोचते न दारिद्रयम्)